भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता पहल

पाठ्यक्रम: GS3/रक्षा एवं सुरक्षा / विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी / अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • भारत के रक्षा मंत्री ने महाराष्ट्र के शिरडी में नाइबे समूह के रक्षा विनिर्माण परिसर के उद्घाटन के दौरान यह बल दिया कि जो राष्ट्र अपने हथियार स्वयं निर्मित करने में सक्षम होते हैं, वे अपना भाग्य स्वयं निर्धारित करते हैं।

कार्यक्रम के बारे में

  • रक्षा विनिर्माण परिसर: इस सुविधा में उन्नत तोपखाना प्रणाली, मिसाइल एवं अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, रॉकेट प्रणाली, ऊर्जा सामग्री और स्वायत्त रक्षा प्लेटफ़ॉर्म का निर्माण किया जाएगा।
  • सूर्यास्त्र रॉकेट प्रणाली:  भारत की प्रथम 300-किमी यूनिवर्सल रॉकेट लॉन्चिंग प्रणाली “सूर्यास्त्र” का शुभारंभ इस कार्यक्रम में किया गया।
    • इस प्रणाली से संबंधित एक समर्पित मिसाइल परिसर की आधारशिला भी रखी गई।
  • स्वदेशी प्रौद्योगिकियाँ प्रस्तुत: स्वदेशी टीएनटी संयंत्र प्रौद्योगिकी का अनावरण किया गया।
    • स्वदेशी आरडीएक्स संयंत्र प्रौद्योगिकी भी प्रस्तुत की गई।
    • नवीकरणीय जैव-ऊर्जा संपीड़ित बायोगैस संयंत्र का उद्घाटन किया गया।
    • नाइबे समूह और ब्लैक स्काई के बीच उपग्रह असेंबली सहयोग हेतु समझौता ज्ञापन (MoU) का आदान-प्रदान हुआ।

भारत में रक्षा उत्पादन

  • क्षेत्रीय योगदान: वित्त वर्ष 2024-25 में रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) ने कुल रक्षा उत्पादन में 57.50% योगदान दिया, जबकि भारतीय आयुध कारखानों ने 14.49% और गैर-रक्षा सार्वजनिक उपक्रमों ने 5.4% योगदान दिया।
  • रक्षा बजट वृद्धि: 2013-14 में ₹2.53 लाख करोड़ से बढ़कर 2025-26 में ₹6.81 लाख करोड़ हो गया।
  • उत्पादन उपलब्धि: 2024-25 में भारत ने अब तक का सर्वाधिक ₹1.50 लाख करोड़ का रक्षा उत्पादन प्राप्त किया, जो 2014-15 के ₹46,429 करोड़ से तीन गुना अधिक है।
  • स्वदेशी उत्पादन में वृद्धि: अब 65% रक्षा उपकरण घरेलू स्तर पर निर्मित होते हैं, जबकि पहले 65-70% आयात पर निर्भरता थी।
    • लक्ष्य: भारत 2029 तक ₹3 लाख करोड़ रक्षा उत्पादन का लक्ष्य रखता है, जिससे वह वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करेगा।

रक्षा आत्मनिर्भरता का महत्व

  • सामरिक स्वायत्तता: विदेशी शक्तियों पर निर्भरता समाप्त कर राष्ट्र की संप्रभु विदेश नीति और स्वतंत्र कार्रवाई सुनिश्चित करता है।
  • संचालन सुरक्षा: विदेशी नियंत्रित तकनीक (जैसे GPS या सॉफ़्टवेयर) पर निर्भरता समाप्त कर संवेदनशील सैन्य ढाँचे और कमांड प्रणाली की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
  • अनुकूलित रक्षा: सैन्य बलों को अपनी भौगोलिक परिस्थितियों, सामरिक खतरों एवं युद्ध सिद्धांतों के अनुरूप प्लेटफ़ॉर्म (जैसे तोपखाना और मिसाइल) तैयार करने की सुविधा देता है।
  • आर्थिक विकास: घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देता है, आयात बिल कम करता है, उच्च-प्रौद्योगिकी रोजगार उत्पन्न करता है और भविष्य में रक्षा निर्यात से राजस्व अर्जित करता है।

रक्षा विनिर्माण को प्रोत्साहन देने हेतु सरकारी उपाय

  • रक्षा औद्योगिक गलियारे एवं स्वदेशी उत्पादन: तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में दो रक्षा औद्योगिक गलियारे स्थापित किए गए हैं।
  • सरकारी योजनाएँ: iDEX (रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार) और DTIS (रक्षा परीक्षण अवसंरचना योजना) रक्षा एवं एयरोस्पेस क्षेत्र में नवाचार को सक्षम बनाती हैं।
  • सृजन पहल: 2020 में रक्षा उत्पादन विभाग (DDP) द्वारा आत्मनिर्भर भारत के अंतर्गत स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने हेतु शुरू की गई।
  • ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस  (EoDB):
    • 2019 में रक्षा उत्पाद सूची को सरल बनाया गया।
    • रक्षा लाइसेंस की वैधता तीन वर्ष से बढ़ाकर 15 वर्ष कर दी गई, जिसे आगे 18 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है।
  • रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (DAP) 2020: स्वदेशी डिज़ाइन, विकास और विनिर्माण को बढ़ावा देती है तथा “मेक इन इंडिया” श्रेणियों को प्राथमिकता देती है।

चुनौतियाँ

  • कई उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों और महत्वपूर्ण घटकों के लिए भारत अब भी आयात पर निर्भर है।
  • रक्षा क्षेत्र में अनुसंधान एवं विकास व्यय अपेक्षाकृत सीमित है।
  • जेट इंजन, सेमीकंडक्टर, साइबर युद्ध और उन्नत सेंसर जैसे क्षेत्रों में तकनीकी अंतराल उपस्थित हैं।
  • निजी क्षेत्र की भागीदारी अब भी नियामक और खरीद संबंधी चुनौतियों का सामना करती है।
  • रक्षा निर्यात में वैश्विक प्रतिस्पर्धा प्राप्त करने हेतु सतत निवेश और गुणवत्ता आश्वासन तंत्र आवश्यक है।

आगे की राह

  • भारत को उभरती रक्षा प्रौद्योगिकियों में स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास क्षमताओं को सुदृढ़ करना चाहिए।
  • DRDO, निजी उद्योगों, स्टार्टअप्स और शैक्षणिक संस्थानों के बीच अधिक सहयोग आवश्यक है।
  • रक्षा औद्योगिक गलियारों और विनिर्माण क्लस्टरों का और विस्तार किया जाना चाहिए।
  • उभरती रक्षा प्रौद्योगिकियों के लिए विशेष कौशल विकास एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए।

Source:TH 

 

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